

मिथिला पब्लिक न्यूज़, समस्तीपुर ।
कोरोना के दूसरी लहर के बाद बिहार में करोड़ों रुपये की लागत से सरकारी अस्पतालों में 119 ऑक्सीजन प्लांट (पीएसए) लगाये तो गये, लेकिन आम मरीजों को इसका कोई फायदा नहीं मिला. अगर फायदा हुआ तो सिर्फ उस एजेंसी को जिसके माध्यम से अस्पतालों में इस प्लांट की स्थापना की गई. जानकार सूत्रों की मानें तो पीएसए प्लांट लगाने में बड़ी गड़बड़ी की गयी है. अगर सरकार इसकी सही तरीके से जांच करवाये तो करोड़ों का घोटाला उजागर हो सकता है.

कहा जा रहा है कि पीएसए प्लांट में लगने वाले उपकरण एवं उसके मेटेरियल काफी निम्न स्तर के लगाये गए हैं. इसी का परिणाम है कि आज तक कोई प्लांट सही तरीके से चल नहीं पाया है. जिस प्लांट को 95% से अधिक प्यूरिटी के साथ ऑक्सीजन बनाना चाहिए, उस प्लांट से मात्र 25 से 35% प्यूरिटी वाला ऑक्सीजन निकल रहा है. जो किसी भी हालत में मरीजों को नहीं दिया जा सकता है. ऐसा क्यों हो रहा है इसकी अगर सही तरीके से जांच करायी जाय तो सच्चाई खुद सामने आ जायेगी.

सिर्फ समस्तीपुर जिले में नजर दौड़ाएं तो वर्तमान में एक भी ऑक्सीजन प्लांट चालू हालत में नहीं है. किसी जगह पर ऑपरेटर नहीं, किसी जगह पर विद्युत आपूर्ति नहीं, कहीं जरनेटर सुविधा नहीं, कहीं इलेक्ट्रिक पैनल में गड़बड़ी, कहीं पाइप लाइन खराब तो कहीं मशीन में खराबी है. जो चालू है उसके ऑक्सीजन में प्यूरिटी नहीं है.

शनिवार को समस्तीपुर सदर अस्पताल के पीएसए प्लांट को चालू किया गया था. लेकिन प्यूरिटी मात्र 30% देखकर बंद कर दिया गया. जानकार बताते हैं की पीएसए प्लांट के लागत मूल्य का करीब आधा हिस्सा उसके कच्चे मेटेरियल की खरीदारी में ही लग जाती है. अगर उस मेटेरियल की गुणवत्ता कमजोर हुई तो लाजमी है कि ऑक्सीजन की प्यूरिटी भी निम्न होगी. यही कारण है कि ऑक्सीजन प्लांट चालू होने के वाबजूद प्लांट के ऑक्सीजन उपयोग के लायक नहीं हैं. अब इसे उपयोग लायक तभी बनाया जा सकता है जब पीएसए प्लांट के लिए लाखों रुपए मूल्य के मेटेरियल की खरीदारी की जायेगी. नहीं तो यह ऑक्सीजन प्लांट बस खाली डिब्बे का घर बन कर रह जायेगा.

अब स्थिति यह है कि विभागीय अधिकारी बस करोड़ों रुपये की लागत से बनाये गये इन प्लांट को चालू करने के नाम पर कागजी घोड़ा दौड़ाने में जुटे हैं. एक बार फिर इस ऑक्सीजन प्लांट को चलाने के नाम पर लाखों रुपये के जरनेटर की खरीदारी की गयी. जो कहा जा रहा है कि वह भी हाथी का दांत बनकर रह जायेगा या अस्पताल परिसर में विद्युत आपूर्ति के लिए उसका उपयोग किया जायेगा.

यहां बता दें कि जिला अस्पताल के साथ साथ अनुमंडलीय अस्पतालों में करीब दो साल पूर्व करोड़ों रुपए की लागत से ऑक्सीजन (पीएसए) प्लांट लगाये गये थे. पीएम केयर्स योजना के तहत इस जीवनदायिनी प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य मरीजों की जान बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर ऑक्सीजन का आपूर्ति किया जाना था. लेकिन यह खुद विभागीय कुव्यवस्था की भेंट चढ़ गया. अब खराब पड़ा यह ऑक्सीजन प्लांट स्वास्थ्य व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है. अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसे ऑक्सीजन प्लांट पर करोड़ों रुपए खर्च क्यों किये गये. करोड़ों रुपये लागत के इन प्लांट के उपकरणों की गुणवत्ता को क्यों नहीं चेक किया गया. इसकी मेंटेनेंस की जिम्मेवारी किसकी थी?

विभागीय अधिकारी कहते हैं कि ऑक्सीजन प्लांट तकनीकी गड़बड़ियों के कारण बंद पड़ा है. इसकी प्यूरिटी बहुत खराब हो चुकी है. इस गड़बड़ी को ठीक कराने के लिए विभाग से पत्राचार भी किया गया है, लेकिन अभीतक विभाग का कोई दिशा निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है.
कोरोना काल में लगा था ऑक्सीजन प्लांट :

कोरोना काल के दूसरे फेज के समय ऑक्सीजन की काफी किल्लत हुई थी. जिसके बाद सभी जिलों के भांति समस्तीपुर में भी कई स्थानों पर पीएम केयर्स फंड एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से ऑक्सीजन प्लांट लगवाये गये थे. ताकि अस्पताल के वार्डों में भर्ती मरीजों को पाइपलाइन के जरिये बेड पर ही ऑक्सीजन उपलब्ध कराया जा सके.

जिले के सदर अस्पताल सहित रोसड़ा, दलसिंहसराय, पटोरी एवं पूसा, उजियारपुर, ताजपुर आदि अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट लगाया गया था. जिसमें सदर अस्पताल में लगाए गए ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता 500 एलपीएम (लीटर प्रति मिनट) वहीं पटोरी अनुमंडल अस्पताल के ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता 500 एलपीएम, रोसड़ा एवं दलसिंहसराय में लगाए गए ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता ढाई-ढाई सौ एलपीएम एवं पूसा अनुमंडलीय अस्पताल में लगाए गए ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता 200 एलपीएम थी.












