फर्जी अस्पतालों पर नहीं होती कार्रवाई, फाइलों तक ही सिमट कर रह जाती है जांच रिपोर्ट, आला अधिकारी नहीं लेते एक्शन


मिथिला पब्लिक न्यूज, कमलेश झा ।

समस्तीपुर में फर्जी अस्पतालों का गोरखधंधा स्वास्थ्य विभाग के अनदेखी के कारण ही फलफूल रहा है। तभी तो जांच रिपोर्ट एवं कार्रवाई का आदेश भी फाइलों तक ही सिमट कर रह जाता है। किसी बड़ी घटना के बाद विभाग खानापूर्ति के लिए जांच टीम तो गठित कर देती है, लेकिन उसी जांच टीम के रिपोर्ट पर विभाग के आला अधिकारी एक्शन नहीं लेते हैं।

जिसका नतीजा है कि कार्रवाई के आदेश के बावजूद जिला मुख्यालय के साथ साथ ताजपुर, कल्याणपुर, खानपुर, दलसिंहसराय, विभूतिपुर, रोसड़ा सहित लगभग पूरे जिले में काफी संख्या में खुलेआम फर्जी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार इसी तरह का एक जांच रिपोर्ट सिविल सर्जन कार्यालय में करीब दो साल से धूल फांक रहा है।

सूत्र बताते हैं कि यह रिपोर्ट ताजपुर पीएचसी प्रभारी के द्वारा 28 फरवरी 2022 को सिविल सर्जन को भेजा गया था। जिसमें उन्होंने ताजपुर में संचालित 30 से अधिक अस्पतालों को गैर निबंधित बताया था। एवं डेढ़ दर्जन अस्पताल को पूरी तरह से फर्जी बताया था। कुछ इसी तरह खानपुर प्रखंड में भी जांच में मिली गड़बड़ी को लेकर आठ अस्पताल, दलसिंहसराय में डेढ़ दर्जन अस्पताल के साथ साथ कल्याणपुर एवं जिला मुख्यालय के भी कई अस्पताल को बंद करने का आदेश दिया गया था।

लेकिन उन अस्पतालों पर प्रशासनिक अनदेखी के कारण ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी। जिला मुख्यालय के कुछ अस्पतालों को सील भी किया गया था। इसके वाबजूद लगभग सभी अस्पताल नाम बदलकर चलाये जा रहे हैं।कुछ अस्पतालों को दूसरे मकान में शिफ्ट कर दिया गया है।

क्या था ताजपुर का मामला :
18 नवंबर 2021 को सिविल सर्जन ने ताजपुर पीएचसी प्रभारी को वहां चल रहे अस्पतालों की जांच करने का आदेश दिया था। जिसके बाद 22 नवम्बर 2021 से 24 जनवरी 2022 तक आठ चरण में अस्पतालों की जांच की गयी। जिसकी रिपोर्ट 28 फरवरी 2022 को पीएचसी प्रभारी ने सिविल सर्जन कार्यालय को सौंपा था।
जिसमें उन्होंने ताजपुर में संचालित 30 से अधिक अस्पतालों को गैर निबंधित एवं डेढ़ दर्जन अस्पताल को पूरी तरह से फर्जी बताया था। उस समय ताजपुर में मात्र एक अस्पताल में ही वैध  कागजात मिले थे।

बताया जाता है कि जांच के बाद तीन अस्पतालों के संचालकों ने अपने नर्सिंग होम को बंद कर दिया था। 19 अस्पताल के पास निबंधन से सम्बंधित उचित कागजात नहीं थे। जबकि 13 अस्पतालों में कार्य करने वाले जिन चिकित्सक का नाम मिला था, वह सब फर्जी था। वहां मरीजों का इलाज, ऑपरेशन एवं प्रसव सहित सभी कार्य झोला छाप डॉक्टर ही करते थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि दो और तीन कमरे के मकान में चलने वाले इन सभी नर्सिंग होम को काम करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। मानव जीवन को संकट में डालने वाले ये नर्सिंग होम संचालक कठोर कार्रवाई के पात्र है। लेकिन इस रिपोर्ट को विभाग के आला अधिकारियों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।

जहां से शिकायत बस उसी की होती है जांच :
करीब छह वर्ष पूर्व 2018 में किसी नर्सिंग होम
संचालक द्वारा एक नवजात बच्चे के शव को कचरे के ढेर पर फेंक दिया गया था। जिसे आवारा कुत्ते नोंच-नोंच कर खा गए थे। इस घटना के बाद जमकर बवाल हुआ था। तत्कालीन डीएम चंद्रशेखर सिंह के आदेश पर कुछ अस्पतालों की जांच भी की गयी थी।

जिसमें समस्तीपुर के तीन नर्सिग होम क्रमशः आकाश हॉस्पीटल, तन्नु सेवा सदन एवं श्रीराम हेल्थ एंड चाइल्ड केयर के औटी को सील भी किया गया था। साथ ही कई अन्य निजी अस्पतालों की जांच भी की गयी थी। लेकिन यह मामला भी कुछ ही समय बाद फाइलों में जाकर दब गया। इसके बाद दलसिंहसराय, रोसड़ा एवं सदर अनुमंडल के कई नर्सिंग होम की जांच करायी गयी. लेकिन यह जांच उन्हीं नर्सिंग होम तक सिमट कर रह गयी, जहां की शिकायत मिली थी।

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