

मिथिला पब्लिक न्यूज, कमलेश झा ।
एक बार फिर निजी अस्पताल की लापरवाही ने प्रसव के लिए पहुंची एक महिला एवं उसके बच्चे की जान ले ली है। मामला शहर के पटेल मैदान के पीछे स्थित एक प्राइवेट हॉस्पीटल की है। जहां घटना से आक्रोशित परिजनों ने शनिवार को जमकर हंगामा किया है। घटना की सूचना पर पहुंची नगर थाना की पुलिस घटना की छानबीन में जुटी है। पुलिस ने स्थानीय लोगों की मदद से आक्रोशित भीड़ को समझा बुझाकर शांत करा दिया है।

बताया जाता है कि अस्पताल के डॉक्टर ने मरीज की नाजुक स्थिति को देखने के बाद भी हायर सेंटर रेफर नहीं किया। मरीज का हीमोग्लोबिन मात्र 3.5 ग्राम था। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर अगर उसे रेफर कर देते तो उसकी जान बच जाती, लेकिन डॉक्टर ने मरीज को कुछ नहीं होने की बात कहकर उसका ऑपरेशन करके प्रसव करा देने की बात कही।

घटना को लेकर बताया जाता है कि कल्याणपुर थाना क्षेत्र के अजना गांव निवासी सोनू कुमार की गर्भवती पत्नी चंदा कुमारी को शुक्रवार की रात प्रसव के लिए भर्ती कराया गया था। परिजनों ने बताया कि अस्पताल के डॉक्टर ने रुपया और खून की बंदोबस्त हो जाने पर मरीज का प्रसव करा देने का आश्वासन दिया, लेकिन डॉक्टर ने पहले ही बच्चे को बचा पाने में असमर्थता जताई थी। क्योंकि मरीज को खुन की कमी थी इसलिए वे जच्चा की जान बचाने के लिए खून की व्यवस्था करने में जुट गए। खून की व्यवस्था होने पर डॉक्टर ने ऑपरेशन कर दिया। लेकिन इसी बीच मरीज की स्थिति बिगड़ने लगी। अस्पताल में डाक्टर नहीं थे, जबतक उन्हें बुलाया गया तबतक मरीज की मौत हो गयी।

यहां बता दें कि जिले के लिए यह कोई नई घटना नहीं है। यहां इस तरह की घटनाएं लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन घट रही हैं। लेकिन ना तो स्वास्थ्य प्रशासन और ना ही जिला प्रशासन इस ओर ध्यान दे रही है। वहीं आम लोग भी इसको लेकर जागरूक नहीं हो रहे हैं। तभी तो कम पैसे में इलाज की लालच में अपनी और अपनों की जान गंवा देते हैं।

झोला छाप डॉक्टर करते हैं करामात :
जिले में संचालित फर्जी अस्पतालों के झोला छाप डॉक्टर के लिए मेडिकल नॉर्म्स कोई मायने नहीं रखता है। वे सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। तभी तो मानक को ताक पर रखकर इन अस्पतालों में मरीज को ओटी बेड के बजाय चौकी पर सुला कर ही ऑपरेशन कर दिया जाता है। दो से तीन छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में इन फर्जी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है। जहां सरकारी अस्पतालों से बहला फुसलाकर दलाल मरीजों को पहुंचाते हैं। सबसे ज्यादा इनके झांसे में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं फंसती हैं। इसके पीछे आशा कार्यकर्ताओं का बड़ा हाथ होता है। इन अस्पतालों में सही तरीके से इलाज नहीं होने के कारण मरीजों की स्थिति अक्सर खराब हो जाती है। कईयों की तो मौत तक हो जाती है।

दलालों को मिलता है 30% कमीशन :
सरकारी अस्पतालों के आसपास दलालों के जमावड़ा रहता है। यहीं से पूरा खेल खेला जा रहा है। एंबुलेंस चालक के सहयोग से दलाल सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों को अच्छे और सस्ते इलाज का झांसा देकर निजी अस्पतालों तक पहुंचा देते हैं। जहां इलाज के नाम पर मरीजों को लूटा जाता है। जानकर सूत्र बताते हैं कि निजी अस्पताल में पूरे इलाज में लिए गए रुपये का करीब 30 प्रतिशत इन दलालों को कमीशन दिया जाता है। यह स्थिति जिला मुख्यालय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के फर्जी अस्पताल में ही देखने को नहीं मिलती, बल्कि कई रजिस्टर्ड अस्पतालों में भी देखने को मिलती है। सबसे अधिक शिकार एक्सीडेंटल एवं ग्रामीण क्षेत्र से पहुंचने वाले मरीज होते हैं।

मुआवजा मिलते ही चुप हो जाते हैं लोग :
मरीज के मौत के बाद हंगामा भी खड़ा होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में लोगों का आक्रोश व्यवस्था में सुधार के लिए नहीं होता बल्कि, मुआवजा या अस्पताल के फीस माफी के लिए होता है। अक्सर ऐसा देखा भी जाता है कि अस्पताल से फी माफी या मुआवजा मिलने के बाद पीड़ित पक्ष के लोग शांत होकर बैठ जाते हैं। वे थानों में इसकी शिकायत तक दर्ज नहीं कराते हैं। इससे अस्पताल के साथ साथ स्थानीय पुलिस भी फायदे में होती है। मामले का सेटलमेंट कराने में पुलिसकर्मियों की जेब भी हरी हो जाती है।













