फर्जी अस्पताल : यहां भाड़े पर पहुंचते हैं सरकारी अस्पताल के डॉक्टर, चंद रुपयों के लिए पेशा का कर दिया बेरागड़क


मिथिला पब्लिक न्यूज, कमलेश झा ।
डॉक्टर साहब! आपके ही कुछ कलीग (डॉक्टर) आपके पेशा का बेरागड़क कर दिए हैं। फर्जी अस्पतालों में वे भाड़े पर पहुंचते हैं। खासकर कुछ सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने तो अपने आप को वेश्य.. बना लिया है। इन चंद डॉक्टरों के शैतानी के कारण अब तो लोग आपको ‘धरती के भगवान’ भी कहने से हिचकने लगे। आपलोगों ने तो चुप्पी साध रखी है, शायद यह सोच रहे हैं कि कौन इस गंदगी में हाथ डाले। लेकिन अगर ऐसा ही चलता रहा तो आपका आने वाला नया जेनरेशन, आपकी इस दुर्दशा को देखकर आपके ही पेशा से नफरत करने लगेगा।


अब समस्तीपुर की स्थिति ही देख लिजिये यहां मात्र 125 निजी अस्पताल न्यू क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हैं, लेकिन संचालन सैकड़ों निजी अस्पताल का किया जा रहा है। दर्जनों नर्सिंग होम एवं इमरजेंसी हॉस्पीटल में कोई डॉक्टर नहीं है। ऐसे अस्पताल फर्जी कागजात, भाड़े के डॉक्टरों एवं उनके किराये के डिग्री के भरोसे ही चलाये जा रहे हैं। इसमें कई ऐसे अस्पताल भी हैं जो न्यू क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड भी हैं, लेकिन फर्जी तरीके से। अगर जिला प्रशासन इसका सही तरीके से जांच करे तो कई रजिस्टर्ड अस्पताल में भी ताला लटक सकता है।


एक तरफ जहां जिला प्रशासन ने इसको लेकर मौन धारण कर रखा है, वहीं स्वास्थ्य विभाग के क्या कहने। सूत्रों की मानें तो इस विभाग के जो बड़का साहब हैं, वो खुद हर विधा में पारंगत हैं। कार्रवाई का धौंस दिखा कर सिर्फ वसूली करते हैं। फर्जी कागजातों पर संचालित हो रहे ऐसे अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा देने के नाम पर मरीजों के साथ सिर्फ लूट-खसोट ही किया जाता है। जिस वजह से कभी कभी मरीज की जान पर भी बन आती है। नव नियुक्त DM साहब इस बीमारी का किस तरह से इलाज करते हैं, वह तो आने वाला समय ही बताएगा।


कंपाउंडर के अस्पताल में डॉक्टर करते हैं नौकरी :

पूर्व में डॉक्टर अस्पताल खोलते थे और मरीज के देखभाल के लिए कम्पाउंडर रखा करते थे। लेकिन अब कंपाउंडर के अस्पताल में डॉक्टर नौकरी करते हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार जिले में कंपाउंडर, ड्रेसर, दवा दुकानदार एवं एम्बुलेंस चालकों ने अस्पताल खोल रखा है। इन अस्पतालों के बड़े बड़े बोर्ड पर कई डॉक्टरों के नाम लिखे होते हैं, लेकिन वहां मरीजों का इलाज झोला छाप कंपाउंडर के द्वारा ही किया जाता है। उन अस्पतालों में ना तो डॉक्टर होते हैं और ना ही मानक के अनुसार इलाज की समुचित व्यवस्था ही होती है। अस्पताल की बड़ी बड़ी बिल्डिंग, सजावट, डॉक्टर का नाम एवं अत्याधुनिक सुविधाओं की जानकारी लिखे बैनर पोस्टर को देख मरीज उन अस्पतालों में पहुंच जाते हैं। जहां वे मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक शोषण के शिकार हो जाते हैं।
नर्सिंग होम के लिए लाइसेंस है जरूरी :

राज्य में क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट के तहत नर्सिंग होम संचालन के लिए स्वास्थ्य विभाग से लाइसेंस लेना जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक वर्ष के लिए उन्हें निबंधित किया जाता है। इसके बाद उन्हें हर वर्ष अपना निबंधन रिनुअल भी कराना होता है। इस एक्ट के तहत निजी अस्पताल, प्रसव केंद्र, नर्सिंग होम, क्लीनिक आदि चलाने के लिए वहां मानक के अनुसार मरीजों को सुविधाएं एवं सेवाएं मुहैया करानी होती है। लेकिन जानकार सूत्र बताते हैं कि जिले में तीन सौ से अधिक ऐसे क्लीनिक, अस्पताल, नर्सिंग होम का संचालन किया जा रहा है, लेकिन निबंधित अस्पतालों की संख्या मात्र 125 है। कुछ अस्पतालों ने निबंधन के लिए आवेदन किया है, जो प्रक्रियाधीन है।

Leave a Comment

Read More

error: Content is protected !!