
मिथिला पब्लिक न्यूज़, डेस्क ।
हद हो गयी साहब! आपके जिला अस्पताल में अवैध वसूली का खेल चल रहा है, और आप हैं कि अपना रेट खोलते ही नहीं. आप भी बता ही दिजिये, कुछ लोगों का कल्याण तो हो जायेगा. कम से कम आपके कार्यालय से होने वाले काम के लिए बिचौलियों की तलाश में लोगों को इधर से उधर भटकना तो नहीं पड़ेगा. कई फाइलें हैं जो आपके यहां महीनों से घुल फांक रही हैं, लेकिन सुविधा शुल्क के अभाव में उसे बढ़ाया नहीं जा रहा है.

कुछ कार्यालयों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाय तो लगभग अधिकतर कार्यालयों में काम का रेट फिक्स है. जहां खुलेआम निशुल्क स्वास्थ्य सेवा में बख्शीश व सुविधा शुल्क के नाम पर वसूली होती है. गरीब मरीजों को रजिस्ट्रेशन से लेकर डिस्चार्ज होने तक नजराना देना पड़ता है. कुल मिलाकर देखा जाय तो जननी बाल सुरक्षा योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को पूर्णतः निशुल्क स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के सरकारी दावे धरातल पर हवा हवाई साबित हो रहे हैं. जिस वजह से सदर अस्पताल में अक्सर मरीज के परिजनों एवं स्वास्थ्य कर्मियों के बीच कहा सुनी भी होती रहती है. कई बार यह मामला वरीय अधिकारियों तक भी पहुंचती है, लेकिन वह मात्र चेतावनी और स्पष्टीकरण तक ही सिमट कर रह जाती है. जिसका नतीजा है कि सदर अस्पताल में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है. जहां प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं से 2 रुपये निबंधन शुल्क नहीं लेना है, वहां 10 रुपये की वसूली की जाती है.

प्रसव कक्ष एवं इमरजेंसी में दवाई व ब्लड जांच फ्री है, लेकिन वहां दवाई ही नहीं ब्लड जांच भी बाहर के निजी जंचघरों से करवाया जाता है. जिसका जीता जागता उदाहरण शनिवार को देखने को मिला. जहां इमरजेंसी में इलाज के लिए अस्पताल पहुंची केवस निजामत गांव की यास्मीन परवीन नामक एक महिला मरीज के ब्लड सेंपल को जांच के लिए निजी लैब में भेजवा दिया गया. जबकि उस मरीज के पुर्जा पर डॉक्टर के द्वारा लिखी गयी सभी तरह की जांच की निःशुल्क व्यवस्था सदर अस्पताल में थी. लेकिन उसके परिजनों को ओपीडी का समय खत्म हो गया अब जांच नहीं हो सकता यह कहकर बरगला दिया गया. जिस जांच के लिए एक रुपया नहीं लगने थे, उस जांच के लिए मरीज के परिजनों से एक हजार रुपए की वसूली की गयी.

मरीजों को फांसने के फिराक में रहते हैं दलाल :
एदर अस्पताल के आसपास दलालों के जमावड़ा रहता है. जो हमेशा मरीजों को फांसने के फिराक में रहते हैं. दलाल सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों को अच्छे और सस्ते इलाज का झांसा देकर निजी अस्पतालों एवं जांच घरों तक पहुंचा देते हैं. जहां इलाज के नाम पर मरीजों को लूटा जाता है. जानकर सूत्र बताते हैं कि निजी अस्पताल एवं जंचघरों से इन दलालों को करीब 30 प्रतिशत कमीशन दिया जाता है.

क्या है सरकारी व्यवस्था :
सरकार ने जननी बाल सुरक्षा योजना के तहत गर्भवती महिलाओं एवं 45 दिन तक के नवजात बच्चों को दी जाने वाली सभी तरह की स्वास्थ्य सेवाएं पूर्णत: निशुल्क कर रखा है. यहां तक की इनसे निबंधन शुल्क के रूप में ली जाने वाली 2 रुपये की छोटी राशि भी नहीं लेनी है. जानकारी के अनुसार गर्भवती महिलाओं से सरकारी अस्पताल में किसी भी प्रकार की जांच में भी कोई राशि नहीं ली जानी है. साथ ही साथ सामान्य प्रसव एवं सिजेरियन के दौरान लगने वाली सभी दवाएं भी इन्हें निशुल्क मुहैया कराया जाना है. इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर प्रसव के दौरान ब्लड भी इन्हें निशुल्क में मुहैया कराने का आदेश है. साथ ही प्रसव के लिए आने जाने के लिए निःशुल्क एम्बुलेंस भी मुहैया कराया जाता है. अगर प्रसव के बाद नवजात शिशु की तबियत खराब होती है तो अस्पताल लाने एवं घर पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस की निःशुल्क व्यवस्था की जानी है.

निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा कितनी होती है वसूली
प्रसव के लिए निबंधन में 10 से 20
प्रसव के उपरांत नर्स को 500 से 1000
प्रसव के उपरांत ममता/दाई 100 से 300
सामान्य प्रसव के बाद डिस्चार्ज 100 से 200
सिजेरियन के बाद डिस्चार्ज 200 से 300
नवजात को बीसीजी की सुई 20 से 50
एआरबी का टीका लेने में 20 से 50
ओडी स्लिप एवं फर्दबयान में 1500 से 3000
(आंकड़ा मरीजों से ली गई जानकारी एवं पूर्व में सामने आये मामलों पर आधारित है)

क्या कहते हैं सिविल सर्जन :
इस तरह की गड़बड़ी पर नजर रखने की जिम्मेवारी अस्पताल के उपाधीक्षक एवं स्वास्थ्य प्रबंधक की है.
डॉ एसके चौधरी, सिविल सर्जन, समस्तीपुर












